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Introduction

मध्य प्रदेश के अशोक नगर जिले में स्थित चंदेरी एक छोटा लेकिन ऐतिहासिक नगर है। मालवा और बुन्देलखंड की सीमा पर बसा यह नगर शिवपुरी से १२७ किलोमीटर, ललितपुर से ३७ किलोमीटर और ईसागढ़ से लगभग ४५ किलोमीटर की दूरी पर है। बेतवा नदी के पास बसा चंदेरी पहाड़ी, झीलों और वनों से घिरा एक शांत नगर है, जहां सुकून से कुछ समय गुजारने के लिए लोग आते हैं। बुन्देल राजपूतों और मालवा के सुल्तानों द्वारा बनवाई गई अनेक इमारतें यहां देखी जा सकती है। इस ऐतिहासिक नगर का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। ११वीं शताब्दी में यह नगर एक महत्वपूर्ण सैनिक केंद्र था और प्रमुख व्यापारिक मार्ग भी यहीं से होकर जाते थे। वर्तमान में बुन्देलखंडी शैली में बनी हस्तनिर्मित साड़ियों के लिए चन्देरी काफी चर्चित है।

इतिहास

चंदेरी मालवा और बुंदेलखंड की सीमा पर बसा है. इस शहर का इतिहास 11वीं सदी से जुड़ा है, जब यह मध्य भारत का एक प्रमुख व्यापार केंद्र था. मालवा, मेवाड़, गुजरात के प्राचीन बंदरगाह और डक्कन इससे जुड़े हुए थे. चंदेरी मध्य प्रदेश के अशोक नगर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है. बुन्देलों और मालवा के सुल्तानों की बनवाई कई इमारतें यहां देखी जा सकती है. इसका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है. चंदेरी बुन्देलखंडी शैली की साड़ियों के लिए काफी प्रसिद्ध है. पारंपरिक हस्तनिर्मित साड़ियों का यह एक प्रसिद्ध केंद्र है. चंदेरी पर गुप्त, प्रतिहार, गुलाम, तुगलक, खिलजी, अफगान, गौरी, राजपूत और सिंधिया वंश ने शासन किया है. राणा सांगा ने चंदेरी को महमूद खिलजी से जीता था. जब सभी प्रदेशों पर मुगल शासक बाबर का आधिपत्य था तो 1527 में एक राजपूत सरदार ने चंदेरी पर अपनी पताका लहराई. इसके बाद इसके शासन की बागडोर जाट पूरनमल के हाथों में गई. अंत में शेरशाह ने छल से पूरनमनल को हराकर इस किले पर कब्जा किया. यहां पर 9वीं और 10वीं सदी के कई जैन मंदिर स्थित हैं. इसकी वजह से यहां जैन तीर्थयात्री बड़ी संख्या में पहुंचते हैं.

चंदेरी को चित्तौड़ के राणा सांगा ने सुलतान महमूद खिलजी से जीतकर अपने अधिकार में कर लिया था। लगभग सन् १५२७ में मेदिनी राय (राजपूत राजा) नाम के एक राजपूत सरदार ने, जब अवध को छोड़ सभी प्रदेशों पर मुगल शासक बाबर का प्रभुत्व स्थापित हो चुका था, चंदेरी में अपनी शक्ति स्थापित की। फिर पूरनमल जाट ने इसे जीता। अंत में शेरशाह ने आक्रमण किया। लंबे घेरे के बाद भी किला हाथ न आया तो संधि प्रस्ताव किया जिसमें पूरनमल का सामान सहित सकुशल किला छोड़कर चले जाने का आश्वासन था। किंतु नीचे उतर आने पर शेरशाह ने कत्लेआम की आज्ञा दी और भयंकर मारकाट के बाद किले को जीत लिया।